Aadikalin Raso Sahitya आदिकालीन रासो साहित्य

Aadikalin Raso Sahitya आदिकालीन रासो साहित्य : हिंदी साहित्य के इतिहास के अंतर्गत आज हम रासो साहित्य के बारे में विस्तार से वर्णन करने जा रहे है आप इस पोस्ट को पूरा पढने की कोशिश करना क्योकि इस पोस्ट के माध्यम से हमने शोर्ट ट्रिक का प्रयोग किया गया है –

Aadikalin Raso Sahityaआदिकालीन रासो साहित्य
 Aadikalin Raso Sahitya आदिकालीन रासो साहित्य

बीसलदेव रासो

विक्रम संवत – 1212 प्रमाणित ग्रन्थ

नायिका – राजमती

नायक – विग्रह राज चतुर्थ ( आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार)

विग्रह राज तृतीय (नगेन्द्र के अनुसार )

बीसलदेव रासो चार खण्डो में विभाजित हैं –

प्रथम खण्ड – मालवा के भोज परमार की पुत्री राजमती का सांभर के राजा बीसलदेव से विवाह ।

द्वितीय खण्ड- बीसलदेव का रूठकर उडीसा जाना, वहाँ 12 माह तक रहना । (डॉ. नगेन्द्र के अनुसार 12 वर्ष तक )

तृतीय खण्ड- राजमती का विरह वर्णन व बीसलदेव का उड़ीसा से लौटना।

चतुर्थ खण्ड- भोज का अपनी पुत्री को घर ले आना व बीसलदेव का वहां जाकर राजमती को फिर चितौड़ लाना।

यह श्रृंगार रस प्रधान काव्य है।

आचार्य शुक्ल के अनुसार वीरगीत के रूप में हमें सबसे पुरानी पुस्तक बीसलदेव रासों मिलती है।

बच्चनसिंह व नगेन्द्र ने इसे गेय काव्य कहा ।

बारह मासा वर्णन परम्परा बीसलदेव रासो से मानी जाती है

बीसलदेव रास के सम्पादनकर्ता – माता प्रसाद गुप्त व अगरचंद नाहटा।

कुसुमराय के अनुसार बारहमासा की शुरुआत आश्विन माह से हुई।

जायसी ने नागमती वियोग खंड में बारहमासा का प्रारम्भ आषाढ़ मास से किया ।

नगेन्द्र के अनुसार यह काव्य सामंती जीवन के प्रति गहरी अरुचि का सजीव चित्र है।

डॉ. गणपति चंद्र गुप्त ने इसे विरह काव्य कहा।

बीसलदेव रासो की भाषा ‘ राजस्थानी मिश्रित हिंदी ‘ है।

इस गेय काव्य में कुल 128 छंद है।

पृथ्वीराज रासो

यह अर्द्ध प्रमाणिक प्रबन्ध महाकाव्य चन्द्रवरदाई द्वारा रचित ।

समय – 1225 – 1249 वि.स.

आचार्य शुक्ल के अनुसार हिन्दी का प्रथम महाकाव्य

चन्दवरदाई हिन्दी का प्रथम महाकवि (भट्ट जाति)

69 समय या अध्याय (59 चन्द्रवरदाई 10 जल्हण )

68 प्रकार के छन्दों का प्रयोग

प्रमुख छंद – छप्पय, त्रोटक, दुहा

शिवसिंह सेगर ने चन्दवरदाई को छप्पयों का बादशाह कहा।

आचार्य शुक्ल ने पृथ्वीराज रासो को जाली ग्रन्थ कहा ।

बच्चनसिंह ने इसे राजनीति की महाकाव्यात्मक त्रासदी कहा।

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे शुक-शुकी संवाद पर आधारित माना।

नोट: – कीर्तिलता – भृंग -भृंगी संवाद पर आधारित

चन्द्रवरदाई की वंश परम्परा का उल्लेख सूरदास ने अपनी रचना साहित्य लहरी में किया।

पृथ्वीराज रासो के संस्करण-

1.वृहत्तम संस्करण : – 16306 छन्द

प्रकाशन : नागरी प्रचारिणी सभा काशी से ।

इसकी हस्तलिखित प्रतियाँ उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित।

नागरी प्रचारिणी सभा ने 1585 ई. में हस्तलिखित प्रति आधार पर इसका सम्पादन करवाया ।

इसे 69 समय (अध्याय) व 16306 छन्द है।

धीरेन्द्र वर्मा ने 10709 इसमें रूपक बताए ।

2. मध्यम संस्करण :. 7000 छन्द

यह अबोहर बीकानेर में सुरक्षित।

इसमें अध्यायों के नाम ‘ अप्रकाशय है।

यह 17वीं शताब्दी में लिखित ।

3. लघु संस्करण :- 3500 छन्द

हस्तलिखित प्रतियाँ : अनुप संस्कृत पुस्तकालय बीकानेर में।

इसमें 19 समय व 3500 छन्द है।

4. लघुतर संस्करण :- 1300 छन्द

इसकी खोज अगरचंद नाहटा ने की।

यह समय में विभाजित नही है।

उस पर शोध कार्य जारी है।

डॉ. दशरथ शर्मा ने इसे मूल रासो माना है।

पृथ्वीराज रासो में वीर रस प्रमुख है।

पृथ्वीराज रासों का प्रकाशन – प्रारम्भ. एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल में हो रहा था।

1875 ई. में डॉ. बुलर ने जयानक कृत पृथ्वीराज विजय नामक ग्रन्थ के आधार पर रासो को अप्रमाणिक घोषित कर दिया.

पृथ्वीराज रासों को प्रमाणिक मानने वाले विद्वान –

SHORT TRICK –कर्नल, श्याम मिश्र मोहन – दशरथ

1. कर्नल जेम्स टॉड

2. श्याम सुन्दर दास

3. मिश्र बन्धु

4. मोहन लाल विष्णुलाल पंड्‌या

5. दशरथ शर्मा

अप्रमाणिक मानने वाले विद्वान –

हीरा राम श्यामल मुरारी बुल्हर देवी

1. हीराचन्द्र ओझा

2. रामचन्द्र शुक्ल

3. श्यामल दास

4. मुरारिदान

5. बुल्हर

6. देवी प्रसाद

अर्द्ध प्रमाणिक मानने वाले विद्वान –

सुन मुन हजारी, ओझा

1. सुनीति कुमार चटनी

2. मुनिजन विजय

3. हजारी प्रसाद द्विवेदी

4. दशरथ ओझा

खुमाण रासो

लेखक – दलपत राय

विजयपाल रासो 

लेखक – नलसिंह

हम्मीर रासो 

लेखक – जोधराज

परमार रासो

लेखक : जगनिक

रचनाकाल 1230 विक्रम संवत

जगनिक कालिंजर के राजा परमर्दीदेव का दरबारी भाट कवि था। जिसने महोबे के 2 प्रसिद्ध वीरों आल्हा और उदल का वर्णन किया है।

1865 मे चार्ल्स इलियट के द्वारा आल्हाखंड का प्रकाशन करवाया गया।

श्याम सुंदर दास ने इसे परमालरासो के नाम से प्रकाशन करवाया।

वाटर फील्ड ने इसका प्रकाशन अंग्रेजी मे किया।

इस रचना के गीतों की गेय परम्परा का प्रमुख केंद्र बैंसवाड़ा।

 

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